दारुल उमूर के मदरसा ग्रेजुएट समाज में निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिका | Vishvatimes

दारुल उमूर के मदरसा ग्रेजुएट समाज में निभा रहे महत्वपूर्ण भूमिका

February 11 2018

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मैसूर के पास स्थित 18वीं सदी के प्रसिद्ध शासक टीपू सुल्तान के मकबरे के बिल्कुल करीब नारियल के पेड़ों से घिरा दारुल उमूर पहली नजर में किसी फार्म हाउस-सा प्रतीत होता है। लेकिन भीतर जाने पर यहां विज्ञान और अध्यात्म का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। यहां मदरसा ग्रेजुएट को विज्ञान की बारीकियों के साथ-साथ कौशल विकास का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इतना ही नहीं, जिंदगी को सरल व सुखद बनाने के लिए धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है। यह संस्थान इस्लामिक ज्ञान का केंद्र भी है। 

दारुल उमूर-टीपू सुल्तान एडवांस्ड स्टडी एंड रिसर्च सेंटर उन संस्थानों में शुमार है, जहां मदरसा ग्रेजुएट को कंप्यूटर और अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ प्रबंधन, इतिहास, जीव विज्ञान, भौतिकी, बैंकिंग, वैयक्तिक विकास और नेतृत्व क्षमता का प्रशिक्षण दिया जाता है। इस संस्थान में अनेक विशेषज्ञ व अवकाश प्राप्त प्रोफेसर की मदद से एक साल का विशेष कोर्स चलाया जा रहा है। 

हर साल पूरे भारत में अनेक मदरसों से हजारों ग्रेजुएट पास करते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि वे सिर्फ धार्मिक ज्ञान और रूढ़िवादी शिक्षा ही ग्रहण करते हैं और आधुनिक विषयों पर उनकी कोई पकड़ नहीं होती है। दारुल उमूर चिंतन के इस अंतर को दूर करने की कोशिश कर रहा है। 

दारुल उमूर के महासचिव अब्दुल रहमान कमरुद्दीन कहते हैं कि एक साल के कार्यक्रम का मकसद सुशिक्षित व प्रबुद्ध एवं विज्ञान के जानकार पेशेवरों के माध्यम से समुदाय और राष्ट्र की सेवा करना है। 

संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनेस्को व संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन में सलाहकार रहे कमरुद्दीन ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "हमारा मकसद उलेमा को इस प्रकार से प्रशिक्षित करना है कि वे वैज्ञानिक व प्रशासनिक विषयों में निपुण हों और धार्मिक विषयों के साथ-साथ अन्य विषयों में भी महारत हासिल कर समुदाय का नेतृत्व कर पाएं।"

उन्होंने आगे कहा, "वे समुदाय के नेता के रूप में क्षेत्र में शैक्षणिक व आर्थिक विकास को लेकर लोगों का मार्गदर्शन कर उन्हें मदद करेंगे और उन्हें इस्लाम का सही नजरिया बताएंगे और देश में मौजूद अवसरों की जानकारी देने का प्रयास करेंगे।"

कमरुद्दीन के मुताबिक, टीपू सुल्तान का मानना था कि उनके सभी कर्मचारी सांसारिक और धार्मिक विषयों में अच्छी तरह प्रशिक्षित हों और दारुल उमूर उसी सोच का प्रतिबिंब है। 

इस संस्थान का संचालन खर्च बेंगलुरू के समाजसेवी जियाउल्ला शेरिफ के दफ्तर से चलता है। यहां विद्यार्थियों से कोई शिक्षण शुल्क या भोजनालय का खर्च नहीं लिया जाता है। यहां सब कुछ नि:शुल्क मिलता है। यही नहीं, उनको हर महीने 1,000 रुपये छात्रवृत्ति भी मिलती है। 

दारुल उमूर के अकादमिक निदेशक मोहम्मद हाजिक नदवी ने बताया कि उनके यहां से निकले स्नातकों को समाज में अगुआ व मागदर्शक के रूप में देखा जाता है। 

उन्होंने बताया कि शुरुआत में धार्मिक नेताओं ने दारुल की कार्यपद्धति पर संदेह जाहिर किया, क्योंकि उनको डर था कि सात-आठ साल तक वे जो कुछ अपने विद्यार्थियों को सिखाते हैं, वे सब इस नए संस्थान में आकर समाप्त हो जाएगा। 

हालांकि उन्होंने यह बताया कि कई प्रख्यात धार्मिक नेताओं से निरंतर मार्गदर्शन मिलने से संस्थान को समुदाय की सभी विचारधाराओं के बीच प्रसिद्धि मिली है।

हर साल लिखित परीक्षा व साक्षात्कार के जरिए करीब 30 विद्यार्थियों का चयन होता है। ये छात्र देश के शीर्ष स्तर के मदरसों से आते हैं। कुछ नेपाल से भी आते हैं। उनके दिन की शुरुआत सुबह की प्रार्थना (नमाज) से होती है और इसके बाद वे कसरत करते हैं। दैनिक कार्यक्रम के तहत वे पड़ोस के सरकारी स्कूलों में बच्चों को नैतिक शिक्षा और उर्दू पढ़ाते हैं। 

सुबह के नाश्ते के बाद, पहला अकादमिक सत्र समाचार पत्रों के विश्लेषण और समसामयिक मुद्दों के अध्ययन से शुरू होता है। इसके बाद तुलनात्मक धार्मिक अध्ययन, इतिहास, विज्ञान और अंग्रेजी भाषा पर व्याख्यान की एक श्रंखला चलती है। दोहपर के दो घंटे के सत्र में कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी की शिक्षा दी जाती है। 

सूर्यास्त के बाद छात्र कंप्यूटर पर अभ्यास कार्य करते हैं और परिसर के पुस्तकालय जाते हैं। वहां वे संगोष्ठी की तैयारी करते हैं और अपने एसाइमेंट्स पूरे करते हैं। 

गुरुवार को फील्ड वर्क होता है, जिसमें मलिन बस्तियों, अस्पतालों और कभी-कभी अन्य धार्मिक स्थलों का दौरा किया जाता है। 

संस्थान ने बेंगलुरू की आईटी कंपनी एम पावर को आईटी क्षेत्र में आने वाले नए लोगों को पेशेवर प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए जगह प्रदान की है। कंपनी ने पांच बैच में करीब 100 आईटी पेशेवरों को प्रशिक्षण देने के लिए दारुल उमूर के परिसर व सुविधाओं का उपयोग किया है। 

कमरुद्दीन ने बताया कि भारत में करीब तीन लाख मस्जिद हैं, जिनमें करीब सात-आठ करोड़ मुस्लिम शुक्रवार को सामूहिक रूप से नमाज अदा करते हैं। 

उन्होंने बताया कि अबतक दारुल उमूर से करीब 370 विद्यार्थी निकले हैं, जो अपनी विद्वत्ता से देश-दुनिया में अपने क्षेत्र व सामाजिक सेवा कार्य में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। इनमें से कई प्रोफेसर, आईटी पेशेवर, पत्रकार और इस्लाम धर्म के जानकार व शिक्षक हैं। 

2006 में दारुल उमूर से प्रशिक्षित मोहम्मद अतहर दोहा स्थित एमईएस इंडियन स्कूल में अध्यापन कर रहे हैं। 

दारुल उलूम देवबंद से ग्रेजुएट अतहर ने कहा, "दारुल उमूर में मुझे व्यापक चिंतन और कल्पना शक्ति का विकास करने का मौका मिला और मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ा।"

उन्होंने कहा, "कंप्यूटर, अकाउंटेंसी, प्रबंधन, इतिहास, बैंकिंग और वेबसाइट डिजाइनिंग जैसे विषयों की शिक्षा के अलावा लोगों से बात करने की कला व किसी सभा व सम्मेलन को संबोधित करने की दक्षता मैंने यहीं हासिल की।"

कमरुद्दीन ने कहा कि दारुल उमूर जैसा स्थान देशभर में हो, यह उनका मकसद है। 

उन्होंने कहा कि विज्ञान और अध्यात्म के समेकित रूप में शिक्षा प्रदान करने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के तौर पर टीपू सुल्तान यूनिवर्सिटी की स्थापना करना उनका लक्ष्य है। 

(यह साप्ताहिक फीचर श्रंखला आईएएनएस और फै्रंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता परियोजना का हिस्सा है।)

  • Source
  • आईएएनएस

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