दिलीप कुमार के साथ काम करने का धर्मेद्र का सपना, सपना ही रह गया (आठ दिसंबर धर्मेद्र का जन्मदिन)

December 09 2018

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दो दिन पहले, धर्मेद्र जुहू स्थित अपने बंगले में थे और यह जानते हुए कि आठ दिसंबर को उनका 83वां जन्मदिन है, मैंने उनसे पूछा कि क्या उनका कोई ऐसा सपना है, जो अधूरा है। धर्मेंद्र इन दिनों अपना अधिकांश समय लोनावाला में अपने फार्म में बिताते हैं, जहां वह उर्दू में कविताएं लिखने में व्यस्त हैं। 

वह अत्यंत भावुक हो गए और उन्होंने कहा, "भगवान पंजाब के सानीवाल के रहने वाले इस गरीब के प्रति बड़ा दयालु रहे हैं, जो एक अभिनेता का सपना संजोए बम्बई आया था और वह भी यूसुफ साहब की मात्र एक फिल्म देखने के बाद। मुझे संघर्ष करना पड़ा और यहां तक कि कई बार मुझे भूखा भी रहना पड़ा था। मैं वापस पंजाब भी नहीं जा सकता था, मुझे यहां कोई छोटी भूमिका भी नहीं मिल रही थी। अर्जुन हिंगोरानी, मोहन कुमार, ऋषिकेश मुखर्जी, बिमल रॉय और ओ.पी. रल्हन जैसे महान फिल्मनिर्माताओं का धन्यवाद है, जिन्होंने मुझे इस तरह के किरदार दिए कि आज जो मैं हूं, वह बन पाया।"

उन्होंने अभी भी मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया था और मुझे विभिन्न तरीकों से उन्हें यह याद दिलाना पड़ा। आखिरकार उन्होंने जवाब दिया और कहा कि उनका एक ही सपना था कि किसी फिल्म में दिलीप कुमार के साथ काम करना। कई बार ऐसा लगा कि उनका यह सपना साकार होने वाला है, लेकिन तभी रास्ते में कोई न कोई रोड़ा आ गया और उनका दिलीप साहब के साथ काम करने का सपना अभी तक पूरा नहीं हो पाया। दिलीप कुमार ने उन्हें प्रभावित किया था और जब वह पहली बार उनसे मिले थे तो उन्हें परिवार का हिस्सा समझकर उनके साथ बर्ताव किया था। लेकिन धर्मेद्र उनके साथ काम करने का अवसर पाने के लिए हमेशा ही इंतजार करते रहे।

1980 के दशक की बात है, जब उनका सपना पूरा होते होते रह गया। बी.आर. चोपड़ा 'चाणक्य चंद्रगुप्त' नामक एक फिल्म की योजना बना रहे थे और उन्होंने दिलीप कुमार को चाणक्य व धर्मेद्र को चंद्रगुप्त के रूप में फिल्म में कास्ट कर लिया। फिल्म जगत चोपड़ा की घोषणा और फिल्म बनाने के उनके जुनून को लेकर बहुत उत्साहित था, क्योंकि निर्माता ने उस वक्त एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च किए थे और हॉलीवुड के प्रशिक्षित मेकअप आर्टिस्ट सरोश मोदी को गंजा टोपी डिजाइन करने के लिए लंदन भेजा था, जिसे दिलीप कुमार पूरी फिल्म में पहनने वाले थे। धर्मेद्र उस वक्त दोगुना उत्साहित थे, जब चोपड़ा व उनकी टीम के लेखक कहानी को लेकर उनके पास चर्चा के लिए पहुंचे थे। सब कुछ तय हो चुका था और फिल्म की शुरुआत होने ही वाली थी और निर्माता को अचानक वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा और उनकी यादगार फिल्म बनने का वह सपना वहीं टूट गया। इससे कहीं ज्यादा यह धर्मेद्र के लिए सपना सच होने जैसी बात होती, जो अभी भी उस सुनहरे अवसर के हाथ से निकल जाने पर अफसोस जताते हैं।

ऐसे कई मौके आए जब धर्मेद्र को लगा कि वह अपने पसंदीदा अभिनेता के साथ नजर आ सकते थे। एक मौका उस वक्त आया, जब दक्षिण में कोई निर्माता दिलीप कुमार और उस वक्त के एक और बड़े नायक के साथ 'आदमी' फिल्म बनाने की योजना बना रहा था, लेकिन अंत में वह भूमिका दिलीप कुमार के एक और बड़े प्रशंसक मनोज कुमार को दे दी गई। धर्मेद्र को मनोज से हारने पर कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि वह उनके बहुत अच्छे दोस्त थे और मनोज ने ही उन्हें वापस जाने से रोका था, जब धर्मेद्र को यहां कोई काम नहीं मिल रहा था।

धर्मेद्र को अपने सपने के करीब पहुंचने के मौके के लिए और कई वर्षो तक इंतजार करना पड़ा। आखिरी बार वह बड़ा मौका तब आया, जब दिलीप कुमार ने खुद अपनी पहली फिल्म 'कलिंग' निर्देशित करने का फैसला किया। फिल्म में भूमिका पाने के लिए धर्मेंद्र ने जमीन-आसमान एक कर दिया, लेकिन दिलीप कुमार को उन्हें समझाने में कई दिन लगे कि कहानी में उनके लिए कोई भूमिका नहीं थी, क्योंकि कहानी में धर्मेद्र को उनके (दिलीप) सबसे बड़े बेटे का किरदार निभाना था, जो उनके अनुकूल नहीं था। धर्मेद्र को किसी भी तरह अपने पसंदीदा अभिनेता द्वारा निर्देशित पहली फिल्म के साथ जुड़ना था और उन्होंने दिलीप कुमार से फिल्म में उनके बेटे के रूप में अपने बेटे सनी देओल को कास्ट करने के लिए कहा, जिसके लिए दिलीप कुमार सहमत हो गए। लेकिन सनी, जो उस वक्त रोमांटिक और एक्शन हीरो थे, उन्होंने वह भूमिका निभाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उसमें नकारात्मक छवि दिखाई जा रही थी और उसके बाद उस भूमिका के लिए एक नए अभिनेता को लेना पड़ा।

धर्मेद्र ने कभी भी दिलीप कुमार द्वारा की जा रही किसी भी फिल्म का हिस्सा बनने की कोशिश करना बंद नहीं किया और तो और वह जानते थे कि उन्हें जो भूमिका मिलेगी, वह उसके लायक नहीं होंगे फिर भी वह उस फिल्म में काम करना चाहते थे। वह अपनी आंखों में दूसरा दिलीप कुमार बनने का सपना लेकर बम्बई (अब मुंबई) आए थे, लेकिन उनका सपना अभी भी पूरा नहीं हुआ था।

और जब उन्हें मालूम हुआ कि दिलीप कुमार बहुत बीमार हैं और फिर कभी दोबारा काम नहीं कर पाएंगे, तो उन्होंने कई दिन अवसाद में बिताए और तो और फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में भी सोचा। 

कुछ वक्त पहले जब धर्मेद्र को पता चला कि दिलीप साहब अब बहुत बीमार हो गए हैं, उन्हें किसी का नाम तक याद नहीं है और अपने बहुत अच्छे दोस्तों को भी नहीं पहचान सकते, तक धर्मेद्र रो दिए और उन्होंने कहा, "ऊपर वाला इतना बेरहम क्यों होता है कभी-कभी?." उन्होंने अब बहुत लोगों की तरह दिलीप साहब के घर जाना छोड़ दिया है, क्योंकि उन्हें लगता है कि जब वह उन्हें पहचानेंगे ही नहीं तो उनसे मिलने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। 

(अली पीटर जॉन मुंबई के एक फिल्म पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

  • Source
  • आईएएनएस

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